आयुर्वेद क्या है ?

आयुर्वेद

आयुर्वेद ऋग्वेद का उपवेद है | आयुर्वेद शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है:- आयु और वेद| आयु का अर्थ होता है जो निरंतर गतिमान रहता है अर्थात जिसमे चेतना रहती है उसको आयु कहा जाता है | और वेद शब्द का अर्थ होता है ज्ञान अत: आयुर्वेद का सामान्य अर्थ हुआ जीवन का विज्ञानं | दुसरे शब्दों में जिस शास्त्र के द्वारा आयु का , आहार विहार, शारीरिक सुख दुःख का , रोगों का निदान और शमन (चिकित्सा) आदि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है उस शास्त्र का नाम आयुर्वेद है |

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण निम्न है :-

  1. वात कफ और पित्त संतुलित हो
  2. त्रयोदश अग्निया सम अवस्था में हो
  3. मल मूत्र का निर्बाध विसर्जन हो रहा हो
  4. आत्मा और मन प्रसन्न हो

आयुर्वेद के आठ विभाग है:–

(1) शल्य (Surgery)  :-

विभिन्न प्रकार के प्रस्तर , अस्थि , दूषित वर्ण , आन्तरिक शल्य , गर्भ शल्य आदि के लिए शल्य कर्म किया जाता है यानी आज का मॉडर्न operation ही आयुर्वेद का शल्य कर्म है |

(2) शालाक्य (Ophthalmology, Otology, Rhinology, Dentistry etc.) :-

सिर , आँख , नाक कान में होने वाले रोग की चिकित्सा के लिए शालाक्य चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है |

(3) काय चिकित्सा (medicine) :-

इसके अंतर्गत ज्वर, अपस्मार, कुष्ट आदि रोगों का इलाज किया जाता है |

(4) अगद तंत्र (Toxicology, Medical Jurisprudence) :-

सर्प, कीट आदि के उपदंश से उत्पन्न विष की शांति हेतु उपाय का उल्लेख मिलता है |

(5)  भूत विद्या (Phychiatry, Microbilogy) :-

देव गन्धर्व के आवेश को शांत करने के लिए किये जाने वाले कर्म को भूत विद्या कहते है |

(6)  कौमारभृत्य (Paediatrics ) :-

बालको के भरण – पोषण , धात्री की परीक्षा इत्यादि से सम्बंधित सभी बातो का इसमें उल्लेख मिलता है |

(7) रसायन (Schience of Rejuvenation) :-

आयुष्य , बल और औज की वृद्धि के लिए तथा व्याधि समुदाय को दूर करने के लिए सभी उपायों का इसमें समावेश किया गया है |

(8) बाजीकरण (Schience of Aphrodisiac) :-

वृद्धअवस्था को दूर करना , पौरुष शक्ति को बढाना, शुक्र संशोधन , कमजोर वीर्य से सम्बंधित चिकित्सा का उल्लेख किया गया है |

 

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