चाणक्य नीति

1 ). षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता |
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता ||

भावार्थ – ऐश्वर्य और उन्नति की कामना करने वाले व्यक्तियों
को नींद , तन्द्रा (ऊंघना), भय , क्रोध, आलस्य , तथा दीर्घसूत्रता
(शीघ्र हो जाने वाले कार्यों में भी अधिक देरी लगाने की आदत) –
इन छः दुर्गुणों को त्याग देना चाहिये |

 

2 ). सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न पश्यति।
सन्तुष्टश्चरतो नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्।।

विद्वान व्यक्ति को चाहिए की वे गधे से तीन गुण सीखें । जिस प्रकार अत्यधिक थका होने पर भी वह बोझ ढोता रहता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी आलस्य न करके अपने लक्ष्य की प्राप्ति और सिद्धि के लिए सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए । कार्य सिद्धि में ऋतुओं के सर्द और गर्म होने का भी चिंता नहीं करना चाहिए और जिस प्रकार गधा संतुष्ट होकर जहाँ-तहाँ चर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी सदा सन्तोष रखकर स्व-कर्म में प्रवृत्त रहना चाहिए ।

Share this

Leave a Comment