सूर्य की रचना कैसे हुई ?

जैसा कि हम सभी ने देखा है कि आसमान में बहुत सारे तारे टिमटिमाते हुए नजर आते है | इसी तरह सूर्य भी एक तारा है | और इसका जन्म भी अन्य तारो की तरह ही हुआ है | अन्तरिक्ष में बहुत कम तापमान (-१७३ सें.) पर हीलियम helium और हाईड्रोजन hydrogen  नामक दो गैसे होती है |

ये गैसे इतने कम ताप पर होने के कारण बहुत घने बादलो का रूप धारण कर लेती है | इन गैसों में गुरुत्वाकर्षण बल  Gravitational force भी बहुत ज्यादा होता है | इस बहुत अधिक बल के कारण इन गैसों के कण आपस में बहुत पास आ जाते है | इस तरह इनका बहुत सारे बादलो का पिंड सा बन जाता है | यह तारा बनने की पहली अवस्था होती है, इसलिए इसे प्रोटोस्टार कहते है |

इस अवस्था में इसमें किसी तरह का कोई प्रकाश नहीं होता है | धीरे-धीरे इन गैसों के कण गुरुत्वाकर्षण बल के कारण और भी अधिक पास आ जाते है तो वे एक दुसरे से टकराने लगते है | इस टकराहट के कारण बहुत ही अधिक मात्रा में उर्जा पैदा होती है | शुरुआत में यह जो ताप -१३० सें. था वह १०७ सें. तक पहुँच जाता है | इतने अधिक ताप पर फ्यूजन अर्थात संलयन क्रिया आरम्भ हो जाती है | इस क्रिया में हाईड्रोजन hydrogen  के चार कण मिलकर हीलियम helium का एक कन बनाते है |

जब ऐसा होता है तो ढेर सारी उर्जा ऊष्मा और प्रकाश के रूप में निकलकर बाहर आती है इस प्रकाश के कारण जो नहीं चमकने वाला प्रोटोस्टार चमकने लगता है और एक तारा बन जाता है | इसलिए सूर्य भी एक तारा है और इस तरह इसकी भी रचना हुई है |

और जहाँ तक अन्य तारो की तुलना में इसके बड़े दिखाई देने का प्रश्न है, सूर्य पृथ्वी के निकट होने के कारण बड़ा दिखाई देता है और हमें बहुत गर्मी और रोशनी प्रदान करता है |

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