12th History Chapter 3 notes बन्धु जाति और वर्ग

NCERT SOLUTON CLASS XII HISTORY IN HINDI
 
Bandhutv jaati tatha varg

स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्त्वपूर्ण रही होगी ?
Spasth kijiye ki vishisht parivaro me pitravanshikta kyon mahatvpurn rahi hogi ?

उत्तर:
पितृवंशिकता का अर्थ है की वह वंश परंपरा जो पिता के पुत्र फिर पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि में चलती है l पितृवंशिकता के प्रति झुकाव शासक परिवारों के लिए कोई अनूठी बात नही थीं l आरंभिक समाजों के संदर्भ में इतिहासकारों को विशिष्ट परिवारों के बारे में जानकारी आसानी से मिलजाती है किंतु सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल हो जाता है l
यहाँ एतिहासिक स्रोत के रूप में हम ऋग्वेद के एक मन्त्र का प्रयोग करते हैं जिसमें पुत्रों के लिए पुरोहित प्रार्थना करता है l
यहाँ ऋग्वेद का मतल्ब एक मंत्र है जिसका विवाह संस्कार के दौरान पुरोहित के जरिये पढ़ा जाता था | आज भी अनेक हिंदू विवाह में इसका प्रयोग होता है l
अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे यद्दपि इस प्रणाली में विभिन्नता थी l कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दुसरे का उत्तराधिकारी हो जाता था | महाभारत में भी पितृवंशिकता महत्पूर्ण रही है ऐसे उदाहरण स्वंय महाभारत में ही मिलते है |



क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रीय ही होते थे ? चर्चा कीजिए |
kya arambhik rajyo me shasak nishchit roop se kshatriy hi hote the ?

उत्तर:
यह कथन किसी हद तक सही है कि आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रीयही होते थे l देश के अंदर शुरू से ही वर्ण व्यवस्था थी और चारों वर्णों के लिए अलग-अलग कर्तव्य निर्धारण थे उनके अनुसार सिर्फ क्षत्रीय वर्ग के लोगों को ही शासन करना पड़ता था जिससे बाकी वर्ण के लोगो को सुरक्षित रखा जा सके |
धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में इसका एक आदेश व्यवस्था के रूप में उल्लेख किया गया है l क्षत्रियों का कर्म शासन करना, युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, यज्ञ करवाना, वेद पढ़ना और दान दक्षिणा देना था l
लेकिन यह भी सत्य है की ग्रन्थों में गैर क्षत्रिय राजा होने के प्रमाण भी मिले हैं जैसा की मौर्य, जिन्होंने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया इस विषय पर बहुत गर्मजोशी से बहस होती रही है l मगर ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते थे l चन्द्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य से पता चलता है की भारत में वर्ण व्यवस्था की वजह से आपसी सोहार्द भाई चारा रहता था | क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो एक ब्राह्मण मौर्य को राजा क्यों बनवाता ?

द्रोण, हिडिंबा और मातंग की कथाओं में धर्म मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके उत्तर को भी सपष्ट कीजिए l
Dron, hidimba aur matang ki kathao me dharm mandando ki tulna kijiye v unke uttar ko spasth kijiye .
उत्तर:
आचार्य द्रोण की कथा और धार्मिक मानदंड :-
1. आचार्य द्रोणाचार्य कुरु वंश के राजकुमारों को धनुर्विद्द्या की शिक्षा देते थे l एक बार आचार्य के पास एकलव्य नाम का एक व्यक्ति आया जोकि द्रोण से धनुर्विद्द्या सीखना चाहता था l लेकिन द्रोण ने मना कर दिया एकलव्य ने वन में लौटकर मिट्टी के द्रोण की प्रतिमा बनाई और उन्हें अपना गुरु मानकर वह स्वंय ही तीर चलाने का अभ्यास करने लगा l समय के साथ वो उत्तम धनुर्धारी बनगया था l फिर एकबार कुरु राजकुमार शिकार के दौरान एकलव्य के समीप पहुँच गये और एकलव्य को तीरंदाजी का अभ्यास करते देख लिया और फिर परिचय दे कर एकलव्य ने उसने अपने आप को द्रोण का शिष्य बताया तब द्रोण उसके पास गये और एकलव्य ने उन्हें गुरु के रूप में प्रणाम किया l द्रोण भी उसकी तीर चलाने की विद्द्या को देखकर चकित थे l मगर वो नही चाहते थे की कोई भी उनके शिष्य अर्जुन से अच्छा धनुर्धारी हो इसलिय उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा माँग लिया जिससे वो कभी तीर न चला सके l एकलव्य ने फौरन गुरु को अंगूठा काट के दे दिया |
निष्कर्ष : इस कहानी के जरिये निषादों को यह संदेश दिया जा रहा है की उनकी जान अत्यधिक मूल्यवान है इसीलिए युद्ध क्षेत्र में उन्हें जाने की जरूरत नहीं है बल्कि उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी क्षत्रियो की है l चूँकि एकलव्य बहुत होनहार था और युद्ध में उसकी जान भी जा सकती थी इसीलिए उसकी जान बचाने के लिए उसके गरु ने उसका अंगूठा मांग लिया |



हिडिम्बा की कथा और धर्म के मानदंड :-
1. पांडव गहन वन में चलेगये थे थक कर वो सोगये केवल भीम रखवाली करते रहे l तभी एक नरभक्षी राक्षस को मनुष्य के गंध ने विचलित करदिया उस ने अपनी बहन हिडिंबा को उन्हें पकड़ कर लाने के लिए भेजा वह भीम को देख कर मोहित होगयी और फिर एक सुन्दर स्त्री के वेष में उसने भीम से विवाह का प्रस्ताव किया , जिसे उन्होंने मना कर दिया तभी हिडिंबा का भाई जो राक्षसों का सरदार भी था वहाँ आगया और उसने भीम को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा l भीम ने उसकी चुनोती को स्वीकार कर लिया और उसका वध करदिया इतना शोर सुनकर बाकि के पांडव जाग गये l हिडिंबा ने उन्हें अपना परिचय दिया और भीम के प्रति अपने प्रेम को अवगत कराया l मगर कोई इस बात से सहमत नही होरहा था l युधिष्ठिर इस शर्त पर विवाह के लिए सहमत होगया की भीम दिनभर हिडिंबा के साथ रहेगा और रात्रि होने से पहले हमारे पास आ जायेगा l और फिर उनका विवाह होगया और समय आनेपर हिडिंबा ने एक राक्षस पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम घटोत्कच रखा गया l
निष्कर्ष : : जहाँ एक तरफ भारत में सती , सवित्री स्त्रियाँ थी वही राक्षस जाति में ऐसी भी स्त्रियाँ थी जो कामवासना की पूर्ति हेतु अपने राक्षस भाई को मरवा देती थी | हिडिम्बा एक नरभक्षी राक्षसी थी और जो अपने भाई को मरवा दे वो रात्री में सोते भीम को भी धोखे से मार कर खा सकती थी और इसीलिए युधिष्टर ने शर्त रखी थी की रात्री में भीम उसके पास नहीं रहेगा | कुछ इतिहासकार का यह मत है की राक्षस उन लोगो को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार उन मानदंडों से भिन्न थे जिनका चित्रण ग्रंथों मे हुआ था |

मातंग की कथा और धर्म के मानदंड :
1. एक बार बोधिसत्व ने बनारस नगर के बाहर एक चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्म लिया उनका नाम मातंग था l एक बार वो किसी काम से नगर में गये वहाँ उनकी मुलाकात दिथ्थ मांगलिक नामक एक व्यपारी की पुत्री से हुई l जो उन्हें देखकर चिल्ला उठी l उसके क्रोधित सेवकों ने मातंग की खूब पिटाई की l विरोध में मातंग व्यपारी के घर के बाहर लेट गया l जब घर वालों ने देखा तो दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया l फिर मातंग ने दिथ्थ से विवाह कर लिया l
और उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम माण्डव्यकुमार रखा गया l बड़े होने पर उसने तीन वेदों का अध्यन किया और वो प्रत्येक दिन 16,000 ब्राह्मणों को भोजन करवाता था lएक दिन फटे वस्त्र पहने मातंग अपने पुत्र के दरवाजे पर आये और भोजन माँगा मगर माण्डव्य ने कहा आप एक पतीत आदमी प्रतीत होते हो और उन्होंने भिक्षा देने से मना करदिया और उन्होंने मातंग को अपने घर से बाहर निकलने को कहा और फिर मातंग आकाश में अदृश्य हो गये l पर जाते जाते उन्होंने माण्डव्य से कहा की जिस व्यक्ति को अपने जन्म पर गर्व हो वो व्यक्ति भेंट का पात्र नही होसकता l
निष्कर्ष :

व्यापारी की पुत्री डर के चिल्ला उठी या उसने झूठा बहाना बनाया या झूठी शिकायत की जिससे मातंग की पिटाई की गयी लेकिन बाद में वैश्य वर्ण के पिता ने चंडाल मातंग की बुध्धि से प्रभावित हो कर अपनी कन्या का विवाह मातंग से कर दिया | इसे पता चलता है की सभी वर्गों और जातियों के लोग प्रेम भाव से रहते थे |



 किन मायनो में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो पुरुषुक्त पर आधारित था ?
Kin mayno me samajik anubandh ki bodh avdharna samaj ke us brahmaniy drishtikon se bhinn thi jo purushukt par adharit tha ?
बौद्धों के अनुसार भारतीय समाज में विषमता मौजूद थी लेकिन यह भेद न तो नैसर्गिक है और न स्थायी है जो जन्म के आधार पर ब्राह्मण अपने में ग्रंथो में उल्लेख करते हैं !
सामाजिक अनुबंध के बारे में बौद्धों ने समाज में फैली विषमताओं के सन्दर्भ में एक अलग अवधारण प्रस्तुत की l सुत्तपिटक नामक ग्रन्थ में एक मिथक वर्णित है जो यह बताता है की प्रारंभ में मानव पूर्णतया विकसित नही थे l वनस्पति जगत भी अविकसित था l सभी जीव शांति लोक में रहते थे और प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे जितनी एक समय में भोजन की आवश्कता होती है!

इस स्तिथि में उन्होंने विचार किया की क्या हम एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो क्रोध करने के समय क्रोधित हो जिसकी प्रताड़ना की जानि चाहिए उसको प्रताड़ित करे जिसे क्षमा करनी चाहिए उसे क्षमा करे ! इससे यह ज्ञात होता है की राजा का पद लोगों के कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा को इस सेवा के बदले मे देते थे l
यह मिथक इस बात को दर्शाता है की आर्थिक सामाजिक संबंधों को बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था |

आरंभिक समाज में स्त्री- पुरुष के सभी संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी ? कारण सहित उत्तर दीजिए |
उत्तर:
1. भारत के प्रारंभिक समाजों में, परिवारों में लिंग के आधार पर विषमताएँ विघमान थीं | सभी दंपतियाँ पुत्र की प्राप्ति के लिए भगवान कीअराधना, यज्ञ अन्य अनुष्ठान और मंत्र उच्चारण करते थे | समाज में पितृसत्तात्मक परिवारों का प्रचलन था पितृवंशिकता को ही सभी वर्णों और जातियों में अपनाया जाता था | कुछ इतिहासकार सातवाहनों को इसका अपवाद मानते है और उनके अनुसार सातवाहन मे मातृवंशिकता थी | अनेक राजाओं के नाम के साथ माता के नाम जुड़े हुए हैं | अभिलेखों से सातवाहन राजाओं की कई पीढ़ियों के नाम प्राप्त हुए हैं जैसे की पुट जो की एक प्राकृतिक शब्द है जिसका अर्थ होता है पुत्र |

ही सातवाहन राजशाही परिवारों में समाज में विवाहित स्त्रियाँ अपने पति को सम्मान देती थीं और वे प्राय: अपने गोत्र के साथ जुड़ने में कोई आपत्ति नही करती थीं प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था उस गोत्र के सदस्यस ऋषि के वंशज माने जाते थे
गोत्रों के दो नियम महत्त्वपूर्ण थे- विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नही रख सकते थे |
स्त्री को परिवार में माता के रूप में सम्मान दिया जाता था | राज्य परिवारों में स्त्रियाँ दरबारों में उपस्थित होती थीं । कुछ स्त्रियों ने स्वंम ही राज्य चालाया है वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को परामर्श देती थी l कई बार बड़ा राजकुमार माता की सलाह नही मानता था | कुछ इसी प्रकार का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है की जब पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध शुरू होने वाला था तो गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने के विनती की मगर उसने क्रोध में आकर मना करदिया |

Share this