Economics Important Notes Part-5

Q 41 : सरकारी बजट को परिभाषित करते हुए इसके विभिन्न प्रकार बताइए ?
Ans : आने वाले वित्तीय वर्ष में सरकार को कहां से आय प्राप्त होगी तथा सरकार उस आय को कहां-कहां और कैसे कैसे खर्च करेगी इस का पूर्वानुमान सरकारी बजट कहलाता है |

सरकारी बजट के प्रकार:
i) संतुलित बजट : जिस बजट में सरकार के अनुमानित व्यय उसकी अनुमानित आय के बराबर होते हैं उसे संतुलित बजट कहते हैं |

ii) असंतुलित बजट : जहां अनुमानित व्यय तथा अनुमानित आय बराबर नहीं होते हैं उसे असंतुलित संतुलित बजट कहते हैं | यह बजट दो प्रकार के होते हैं
अधिक्य बजट और घाटे का बजट |
अधिक्य बजट: वो है जब अनुमानित आय अनुमानित व्यय से अधिक होती है |

घाटे का बजट : जब अनुमानित व्यय अनुमानित आय से अधिक होता है तब इसे घाटे का बजट कहते है |

Q 42 : बजट के अर्थ को स्पष्ट करते हुए इसके घटकों का वर्णन करो |
या
बजट प्राप्तिय और बजट व्यय से आप क्या समझते है ?

Ans : आने वाले वर्षों से संबंधित कुल आय तथा कुल खर्च का पूर्वानुमान लगाना बजट कहलाता है |

A ) बजट प्राप्तिया : बजट प्राप्तियो को दो भागों में बांटा जा सकता है:
i) राजस्व प्राप्तिया : इन प्राप्तिओं से सरकार की संपत्तियों में कोई कमी नहीं होती तथा देयता में कोई वृद्धि भी नहीं होती जैसे करो से तथा शुल्क व जुर्माने से प्राप्त आय |

ii) पूंजीगत प्राप्तियां : इन प्राप्तियों या तो संपत्ति कम होती है या फिर देयताओ में वृद्धि हो जाती है जैसे कि ऋण लेना अंश पत्रों की बिक्री इत्यादि |

B) बजट व्यय : इन्हें भी दो भागों में बांटा जा सकता है:-
i) राजस्व व्यय : इस व्यय से सरकार की संपत्ति में कोई वृद्धि नहीं होती है और ना ही दायित्व में कोई कमी होती है जैसे वृद्धावस्था पेंशन , छात्रवृत्ति इत्यादि |

ii) पूंजीगत व्यय : इससे खर्चे से सरकार की संपत्ति में या तो कोई वृद्धि होती है और या दायित्व में कमी होती है | जैसे उधारो का भुगतान करना, संपत्ति की खरीद पर खर्च करना |

Q 43 : शून्य आधारित बजट क्या होता है ?

Ans : इसकी अवधारणा व्यवसाय से ली गई है इस से तात्पर्य यह है कि सरकार केवल वही खर्च करें जिसे लागत लाभ विश्लेषण तकनीक द्वारा उपयोगी सिद्ध किया जा सके जिससे फिजूलखर्ची शून्य हो जाए | इसे ही शून्य आधारित बजट कहते हैं | यह सरकार के राजकोषीय अनुशासन का प्रमाण हैं |




Q 44 : शून्य आधारित प्राथमिक घाटे से क्या अभिप्राय है ?
Ans : शून्य आधारित प्राथमिक घाटे से अभिप्राय है कि सरकार को केवल इसलिए ऋण लेना पड़ रहा है ताकि वह अपने ब्याज के भुगतान के दायित्व को पूरा कर सके | इसके अतिरिक्त वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए वर्तमान ऋणों में कोई वृद्धि नहीं कर रही है |

Q 45 : बजट घाटे से आपका क्या अभिप्राय है ? इसे किस प्रकार पूरा किया जा सकता है ?
Ans : जब सरकार का बजट व्यय उसकी प्राप्तिओं से अधिक होता है तो सरकार को बजट में घाटा होता है इसे ही बजट घाटा कहते हैं |

इसे पूरा करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं :-
i) उधार : सरकार देश की जनता से ऋण के रूप में पूंजी लेकर इसे पूरा करती है |

ii) घाटे की वित्त व्यवस्था : राजकोषीय घाटे को रिजर्व बैंक से उधार लेकर पूरा किया जा सकता है जो सरकारी प्रतिभूतियों के बदले में नए नोट छापकर सरकार को उधार देता है | घाटे की वित्त व्यवस्था से मुद्रास्फीति तथा अन्य कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं |

iii) अन्य देश या विदेशी संस्थाओं से ऋण : सरकार दूसरे देशों से तथा विदेशी संस्थाओं से ऋण लेकर इस घाटे को पूरा कर सकते हैं |

Q 46 : राजस्व बजट तथा पूंजी बजट क्या होता है ?

Ans : राजस्व बजट : इन बजट में सरकार की राजस्व प्राप्तियां तथा राजस्व व्यय शामिल होते हैं |
राजस्व प्राप्तियां से सरकार की ने तो देयता बढती है और न ही परिसम्पत्तियो कम होती है |

राजस्व व्यय :- वे व्यय जिनसे न तो देता घटती है और न ही परिसंपत्तिया बढती है |

पूंजी बजट: इस बजट में सरकार की पूंजीगत प्राप्तिया तथा पूंजीगत व्यय शामिल किए जाते हैं | पूंजी प्राप्तियां से या तो सरकार की देयता बढती है या परिसंपत्तियों में कमी आती है | पूंजी व्यय से या तो देयता घटती है या परिसंपत्तियां बढती है |

Q 47 : प्रगतिशील कर और प्रतिगामी कर किसे कहते हैं ?

Ans : प्रगतिशील कर : अधिकतर देशों में प्रगतिशील कर प्रणाली ही प्रचलित है | इस प्रणाली में आय बढ़ने के साथ-साथ कर की दर भी बढ़ती जाती है | यह न्याय शीलता के सिद्धांत पर आधारित होती है |

प्रतिगामी कर: प्रतिगामी कर में करो कि दर आय की वृद्धि के साथ-साथ घटती जाती है | इसमें आय में तथा कर की दर में ऋणआत्मक सम्बन्ध होता है | यह न्याय शीलता के सिधांत पर आधारित नहीं होता है |

Q 48 : राजकोषीय घाटे से आप क्या समझते हैं? इसके दुष्परिणामों की चर्चा कीजिए | इसे किस प्रकार सीमित किया जा सकता है ?

Aans : राजकोषीय घाटे का संबंध सरकार के राजस्व तथा पूंजीगत दोनों प्रकार के व्यय तथा राजस्व और उधार छोड़कर बाकी पूंजीगत प्राप्तियो से है|

दुष्परिणाम :-

i) किमतो में वृद्धि : भारत में सरकार द्वारा लिए जाने वाले उधार का एक प्रमुख स्त्रोत भारतीय रिजर्व बैंक है | इसे घाटे की वित्त व्यवस्था कहा जाता है | क्योंकि सामान्यतः रिजर्व बैंक सरकार को उधार देने के लिए अधिक नोट छापता है , इसके फलस्वरूप मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है और मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न होती है |

ii) गरीबों को आर्थिक कष्ट : गरीबों के पास पहले से ही धन का अभाव होता है तथा मुद्रास्फीति हो जाने के कारण मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है जिससे गरीबों को ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है |

iii) विदेशों पर निर्भरता : सरकार विश्व से भी उधार लेती है इसके फलस्वरूप दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ जाती है विदेशी ऋण के कारण विदेशों का आर्थिक तथा राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ जाता है |

iv) भावी पीढ़ी पर ऋण का बोझ : सरकार द्वारा उधार लिए जाने से देश की भावी पीढ़ी पर ऋण का भार बढ़ता है | ऐसे देश के विकास में बाधा उत्पन्न होती है |

v) देश से ऋण जाल में फंस सकता है : ऋणों पर ब्याज के भुगतान के कारण राजस्व व्यय में वृद्धि होती है जिसे राजस्व घाटा बढ़ जाता है और सरकार इसकी पूर्ति के लिए और अधिक ऋण लेती हैं | इससे देश ऋण जाल में फंस सकता है |

राजकोट से घाटे का उपाय :

i) राजकोषीय घाटे से उबरने का एक तरीका है कि सरकार अपने खर्चों में कटौती करें | तथा इसकी आए को बढ़ाने के लिए यथासंभव उपाय करने चाहिए |

Q 49 : भुगतान संतुलन या भुगतान शेष से आप क्या समझते हैं ? इसकी कौन-कौन सी मद होती है ?

Ans : एक देश का अन्य विश्व के साथ आर्थिक लेन-देन का विवरण भुगतान संतुलन कहलाता है | यह एक व्यापक अवधारणा है क्योंकि इसमें सभी प्रकार के आर्थिक लेन-देन शामिल होते हैं |

भुगतान संतुलन में तीन प्रकार की मदों को शामिल किया जाता है:-

i) दृश्य मदे : इसमें आयात निर्यात की जाने वाली सभी भौतिक वस्तुएं शामिल किए जाते हैं |
ii) अदृश्य मद : इसमें एक देश का अन्य देशों के साथ सेवाओं के आयात एवं निर्यात का विवरण होता है |

iii) हस्तांतरण भुगतान इसमें सभी प्रकार के वित्तीय लेनदेन को शामिल किया जाता है |

Q 50 : भुगतान शेष में असंतुलन किस कारण से होता है ? से किस प्रकार ठीक किया जा सकता है ?
Ans :
i) आर्थिक कारक: अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं की सरकार देश में विकास के लिए बड़े पैमाने पर आयात करती है फलस्वरूप भुगतान शेष में घाटे का असंतुलन उत्पन्न हो जाता है |

ii) मुद्रास्फीति की ऊंची दर : घरेलू बाजार में मुद्रास्फीति की दर के कारण बड़ी मात्रा में आवश्यक वस्तुओं का आयात करना पड़ता है |

iii) राजनीतिक अस्थिरता : देश में राजनीतिक उथल-पुथल के विदेशों से प्रत्यक्ष निवेश तथा पोर्टफोलियो निवेश में कमी आती है | जिसके कारण भुगतान संतुलन का जमाव पक्ष कमजोर हो जाता है |

iv) ऋण व ब्याज का बोझ : दीर्घ काल में ऋण नहीं चुकाने के कारण उनके ब्याज का बोझ बढ़ जाता है | य से विदेशों से मुद्रा आयात करनी पड़ती है और इस कारण से भुगतान में असंतुलन उत्पन्न होता है |

भुगतान शेष में असंतुलन ठीक करने के उपाय :-

i) निर्यात संवर्धन : सरकार को ऐसे नियम व कानून बनाने चाहिए जिससे निर्यातो में वृद्धि हो | सरकार को निर्यात शुल्क में कमी तथा जनता को निर्यात के लिए प्रेरित करना चाहिए |

ii) आयात प्रतिस्थापन : जो वस्तुएं विदेशों से आयात की जाती हैं उन्हें अपने देश में ही निर्मित करना चाहिए जिससे संतुलन स्थापित हो सके |
iii) शिक्षा में पर्यटन को बढ़ावा: सरकार को अपने देश की घरेलू सीमा में ही शिक्षा व पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए जिससे विदेशी मुद्रा प्राप्त की जा सके |

iv) कीमतों पर नियंत्रण : बढ़ती कीमतों से आयात बढ़ते हैं तथा निर्यात कम होते हैं इसलिए सरकार को न केवल कीमतों की वृद्धि की प्र्वर्ती रोकनी चाहिए बल्कि कीमत गिराने के उपाय भी करने चाहिए |

सभी विद्यार्थी ध्यान दे : अभी हमने 50 महत्वपूर्ण नोटस उपलब्ध करवाए है , बाकी की 50 VV Imp नोटस कुछ ही दिनों में वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जायेंगे | सुचना देने के लिए अभी हमारे पास कोई साधन नहीं है इसीलिए आप रोजाना हमारी www.E-guru.in  वेबसाइट चेक करते रहिये |



Share this

Leave a Comment